मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

"ध्रुव" तारा की story .

ये कहानी सिर्फ ध्रुव की तारा बनने तक ही सीमित नही है, बल्कि ये कहानी एक नन्हे बालक की दृढता, निर्भयता कठोर तपस्या की है।                                         




                         Achhisoch2.blogspot.com                                                                                                                            राजा उतनापाद की दो रानियाँ थी। प्रिय रानी का नाम था सुरुचि और अप्रिय रानी का नाम था सुनीति। दोनो रानियो को एक-एक पुत्र थे। एक दिन सुनीति का ध्रुव खेलता खेलता अपने पिता की गोद मे बैठ गया। प्रिय रानी ने तुरंत ही उसे गोद से नीचे उतारकर कहा:  






                                               "पिता की गोद में बैठने के लिए पहले मेरी कोख से जन्म ले।" ध्रुव रोता-रोता अपनी माँ के पास गया और सब बाते म से कही। माँ ने ध्रुव को समझाया :" बेटा! यह राजगदी तो नशवर है परंतु तू तो भगवान का दर्शन करके शाश्वत गददी प्राप्त कर।" ध्रुव को माँ की सीख बहुत अच्छी लगी और तुरंत ही दृढ़ निश्चय करके तप करने के लिए जंगल में चल गया। रास्ते मे हिन्सक पशु भी मिले फिर भी वह भयभीत नही हुआ। इतने में उसेे देवर्षि नाराद जी मिले। वो ध्रुव को भगवान की भक्ति की विधि बताते हैं जिसे जानने के बाद ध्रुव कठोर तपस्या में लीन हो जाता हैं |

कई महीनो तक खड़े होकर तपस्या करता हैं | कभी जल में तपस्या करता हैं तो कभी एक ऊँगली पर खड़े रहकर | निरंतर ॐ नमो वासुदेवाय का जाप पुरे ब्रह्माण में गूंजने लगता हैं | नन्हे से बालक की इस घौर तपस्या को देख भगवान् उसे दर्शन देते हैं |

बालक ध्रुव भाव विभौर हो उठता हैं और कहता हैं मुझे माता, पिता की गोद में बैठने नहीं देती | मेरी माँ कहती हैं कि आप इस श्रृष्टि के पिता हैं | अतः मुझे आपकी गोद में बैठना हैं | भगवान उसकी इच्छा पूरी करते हैं और उसे तारा बनने का आशीर्वाद देते हैं जो कि सप्त ऋषियों से भी ज्यादा श्रेष्ठ होगा | उस दिन से आज तक आसमान में उत्तर दिशा की और ध्रुव तारा चमक रहा हैं |Achhisoch2.blogspot.com

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